बिहार चुनाव में इस्तेमाल होने जा रही M3 EVM पुरानी मशीनों से किस तरह अलग है?
EVM M3 मशीनों का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में हो चुका है. कहा गया है कि ये टैंपर प्रूफ मैकेनिज़्म पर काम करती हैं.
EVM M3 मशीनों का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में हो चुका है. कहा गया है कि ये टैंपर प्रूफ मैकेनिज़्म पर काम करती हैं.
साल के अंत तक बिहार विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. कम से कम पार्टियों की तैयारियों से तो लगने ही लगा है. भले कोरोना वायरस अभी जाने की तैयारी में न हो. आधिकारिक रूप से तो नहीं, लेकिन ‘चुनावी बिगुल’ जहां कहीं भी रखा होता है, फूंका जा रहा है. चुनाव हैं, तो वोटर की बात होगी. वोटर की बात होगी, तो EVM की बात तो होगी ही. EVM माने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन. पिछले कुछ चुनावों में जिसके आगे भयंकर क्वेश्चन मार्क लगाए गए. EVM टैंपरिंग के आरोप लगे. बैलेट पेपर से फिर से चुनाव करवाने की मांग भी उठ गई. चुनाव आयोग से शिकायतें हुईं.
चुनाव आयोग ने EVM मशीनों में कई तरह के सुधार की बात कही. इन्हीं सुधारों में एक नाम आता है EVM M3 मशीनों का. बिहार चुनाव में EVM के अपग्रेडेड वर्जन M3 या मार्क 3 का इस्तेमाल होने जा रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में इनका इस्तेमाल हो चुका है. बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी एचआर श्रीनिवास ने कहा,
लोकसभा चुनाव में बिहार में कुछ जगहों पर इनका इस्तेमाल हुआ था, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीटों पर इनका पूरी तरह इस्तेमाल किया जाएगा.
सवाल है कि M3 मशीन पिछली मशीनों से अलग कैसे है?
EVM की पुरानी पीढ़ियां M1 और M2 हैं. नाम से ही स्पष्ट है कि M3 ईवीएम की थर्ड जनरेशन है. जाहिर है कुछ नई चीजें होंगी इसमें. उनके बारे में जानेंगे.
पहले थोड़ा EVM के बारे में:
# किसी EVM के दो बेसिक हिस्से होते हैं. एक बैलेटिंग यूनिट. दूसरा कंट्रोल यूनिट.
# बैलेटिंग यूनिट मतलब जहां वोटर वोट डालते हैं. इसमें उम्मीदवारों का नाम और चुनाव चिन्ह होते हैं. आगे नीला बटन होता है. बीप की आवाज़ और लाल बत्ती जलने के साथ वोट पड़ता है. एक बैलेटिंग यूनिट में 16 उम्मीदवारों के नाम होते हैं. NOTA यानी None of the above (इनमें से कोई नहीं) के ऑप्शन सहित.
# कंट्रोल यूनिट, पोलिंग ऑफिसर के पास होती है. इसमें वोट दर्ज होते हैं. स्क्रीन पर डेट टाइम दिखते हैं. बैलेटिंग यूनिट कब शुरू करनी है, कब बंद यहां से कंट्रोल किया जा सकता है.
बायीं तरफ कंट्रोल यूनिट, दायीं तरफ बैलेटिंग यूनिट.
# अब पारदर्शिता के लिए तीसरा हिस्सा भी इस्तेमाल होता है- VVPAT. मतलब वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल. VVPAT मशीन बैलेटिंग यूनिट से जुड़ी होती है. इसमें देखकर वोटर जान सकता है कि उसका वोट सही जगह पड़ा है या नहीं. इसमें पर्ची प्रिंट होती है, जो मशीन में 7 सेकंड तक दिखती है. 10 सेमी लंबी पर्ची में प्रत्याशी का नाम, सीरियल नंबर और चुनाव चिन्ह छपे होते है. VVPAT का पहली बार इस्तेमाल 2013 में नागालैंड की नोकसेन विधानसभा सीट पर हुआ था. 2014 लोकसभा चुनाव में इन्हें प्रयोग के तौर पर 8 सीटों पर इस्तेमाल किया गया. 2019 लोकसभा चुनाव में सभी सीटों पर इसका इस्तेमाल हुआ.
जो नीले रंग का डिब्बा जैसा दिख रहा है, वो VVPAT मशीन है.
तो M3 मशीनें क्यों?
# EVM के पहले वर्जन M1 को अब लगभग रिप्लेस किया जा चुका है. 2006 से 2010 के बीच बने दूसरे वर्जन M2 में कुल 64 उम्मीदवारों की वोटिंग की जानकारी दर्ज की जा सकती है. ऊपर बताया गया कि एक बैलेटिंग यूनिट में 16 उम्मीदवार होते हैं. इससे ज़्यादा उम्मीदवार हुए तो बैलेटिंग यूनिट एक दूसरे में जोड़ दी जाती हैं. ऐसे में इस वर्जन में मैक्सिमम चार यूनिट जोड़ी जा सकती है.
# 2013 के बाद अपग्रेड होकर M3 मशीनें आईं. इस नए वर्जन M3 में कुल 384 उम्मीदवारों की जानकारी दर्ज की जा सकती है. मतलब इसमें 24 बैलेटिंग यूनिट आप जोड़ सकते हैं.
# M3 में सेल्फ डायग्नोस्टिक फीचर हैं. मतलब मशीन खुद जांच कर सकती है कि उसके सारे फंक्शन सही से काम कर रहे हैं या नहीं. कोई दिक्कत होगी, तो कंट्रोल यूनिट की स्क्रीन पर दिखेगी.
EVM को लेकर भारत में काफी बहस होती है कि कई देशों ने इसे बैन कर दिया है, तो यहां भी बैन लगना चाहिए.
# M3 मशीन में डिजिटल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट दोनों के कोड मैच होने चाहिए. अगर कोई दूसरी मशीन या डिवाइस बाहर से इंसर्ट करने की कोशिश की जाए, तो कोड मैच नहीं करेगा. सिस्टम खुद बंद हो जाएगा. यही डिजिटल सर्टिफिकेट है.
# कहा गया है कि ये टैंपर्ड प्रूफ मैकेनिज़्म पर काम करती है. अगर मशीन के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ हो, एक बटन बार-बार दबाया जाए, तो मशीन सिग्नल दे देती है. मशीन खोलने की कोशिश करने पर ये शट डाउन हो जाती है.
# M3 मशीन में चिप को सिर्फ एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है. चिप के सॉफ्टवेयर कोड को पढ़ा नहीं जा सकता.
# इसे इंटरनेट या दूसरे नेटवर्क से कंट्रोल नहीं किया जा सकता.
# M3 मशीनों को सरकारी कंपनियों इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL), हैदराबाद और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (BEL), बेंगलुरू ने बनाया है.
*EVM का पहली बार इस्तेमाल कब हुआ?*
चुनावों में पहले बैलेट पेपर इस्तेमाल होते थे. लेकिन इस प्रक्रिया में समय काफी लगता था. 1982 में पहली बार EVM केरल के पारूर विधानसभा उपचुनाव में इस्तेमाल हुई थी. लेकिन कोर्ट ने चुनाव को ‘नल एंड वॉइड’ बता दिया. क्यों? क्योंकि तब रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल्स ऐक्ट, 1951 में EVM की बात नहीं थी. 1988 में ऐक्ट संशोधित हुआ. 1989 से ये लागू हुआ. इसमें चुनाव आयोग को ताकत दी गई कि वो EVM से चुनाव करवा सकता है.
तब से अब तक EVM से चुनाव होते हैं. हालांकि पंचायत स्तर के चुनाव में अभी भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है. पारदर्शिता लाने के लिए EVM मशीनों के साथ VVPAT का इस्तेमाल शुरू किया गया. इसके बावजूद EVM टैंपरिंग के आरोप बंद नहीं हुए. चुनाव आयोग ने कहा कि M3 मशीनों के जरिए वोटिंग प्रक्रिया और चाक-चौबंद होगी. तो क्या अब पार्टियां EVM पर सवाल नहीं उठाएंगी? इसके लिए इंतज़ार कीजिए अगले चुनाव का


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