🌹🌹🌹अयोध्या विवाद🌹🌹🌹
अयोध्या विवाद कानून 1049 पृष्ठ pdf downloadकरे
लगभग 5 सदी पुराने विवाद व 134 वर्षों की कानूनी लड़ाई के पश्चात अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि पर राम जन्मभूमि मंदिर व बाबरी मस्जिद के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला 9 नवंबर 2019 को सुनाया। शीर्ष अदालत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 अगस्त से 16 अक्टूबर 2019 के दौरान 40 दिन तक तीनों विवादित पक्षों रामलला विराजमान , सुननी वक्फ बोर्ड व निर्मोही अखाड़ा की दलीलें सुनने के पश्चात इस मामले में अपना फैसला सुनिश्चित रख लिया था , जो कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच 9 नवंबर 2000 का नई स्कूल सुनाया गया। इस मामले में रामलला विराजमान को एक न्यायिक व्यक्ति (juristic person) पर्सन सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था अयोध्या के साथ-साथ अन्य संवेदी स्थानों पर भी की गई थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गूगल के अतिरिक्त न्यायमूर्ति एस ए बोबडे जो अब मुख्य न्यायाधीश हैं , न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ , न्यायमूर्ति अशोक भूषण व न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर इस मामले की सुनवाई वाली 5 सदस्यीय पीठ में शामिल थे।
👉 पीठ ने अपने सर्व सम्मत फैसले में विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक स्वीकार करते हुए यह समस्त 2.7 एकड़ भूमि मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट को सौंपने का फैसला सुनाया।(ट्रस्ट का गठन 3 माह के भीतर ही करने को पीटने फैसले में कहा गया है।)
👉 आगे इस भूमि पर मालिकाना हक के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड व निर्मोही अखाड़े के दावों को पीटने यद्यपि खारिज किया है , तथापि 6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराए जाने को कानून का उल्लंघन बताते हुए मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित स्थान पर 5 एकड़ जगह उपलब्ध कराने का निर्देश अपने 1049 पृष्ठों के फैसले में पीठ ने सरकार को दिया है।
👉 इस मामले के तीसरे पक्ष कार निर्मोही अखाड़े के सेवायत हक के दावे को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया है तथापि मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाले ट्रस्ट में उसे प्रतिनिधित्व प्रदान करने का निर्देश न्यायालय ने दिया है। निर्मोही अखाड़े के सदियों से राम लाला के सेवायत होने का दवा करते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण ,रखरखाव एवं सेवा के अधिकार का दावा अपनी दलीलों में किया था।
इस संवेदनशील मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का प्रयास भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इब्राहिम कुली फुल्ला की अध्यक्षता में 3 मध्यस्थों का पैनल सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मार्च 2019 को गठित किया जिस में शामिल किए गए दो अन्य मध्यस्थ अध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राम पंचू थे इस पैनल ने अपनी रिपोर्ट 1 अगस्त 2019 को सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी थी .
जिसमें मध्यस्थता के प्रयास नाकाम रहने की बात कही गई थी . मध्यस्थता के प्रयास नाकाम रहने पर इस मामले में अब पुनः सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अगस्त से अक्टूबर 2019 के दौरान संपन्न ने की थी . लगातार 40 दिन तक चली इस सुनवाई के पश्चात रामलला विराजमान की ओर से दलीलें पेश करने वाले अधिवक्ताओं में 92 वर्षीय पूर्व एटॉर्नी जनरल के परासरण के अतिरिक्त सीएस वैद्यनाथन व पूर्व एडिशनल सॉलीसीटर जनरल पी. एस. नरसिह्मन व गोपाल सिंह विशारद की ओर से पूर्व सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से पी. एन. मिश्र ने , अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से हरी शंकर जैन ने निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील कुमार जैन ने निर्वाणी अखाड़ा के धर्मदास की ओर से जयदीप गुप्ता आदि ने दलीलें पेश की थी। शिया वक्फ बोर्ड कि वकील एम. सी. धींगरा मंदिर के पक्ष में दलीलें न्यायालय में प्रस्तुत की ।
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लगभग 5 सदी पुराने विवाद व 134 वर्षों की कानूनी लड़ाई के पश्चात अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि पर राम जन्मभूमि मंदिर व बाबरी मस्जिद के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला 9 नवंबर 2019 को सुनाया। शीर्ष अदालत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 अगस्त से 16 अक्टूबर 2019 के दौरान 40 दिन तक तीनों विवादित पक्षों रामलला विराजमान , सुननी वक्फ बोर्ड व निर्मोही अखाड़ा की दलीलें सुनने के पश्चात इस मामले में अपना फैसला सुनिश्चित रख लिया था , जो कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच 9 नवंबर 2000 का नई स्कूल सुनाया गया। इस मामले में रामलला विराजमान को एक न्यायिक व्यक्ति (juristic person) पर्सन सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था अयोध्या के साथ-साथ अन्य संवेदी स्थानों पर भी की गई थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गूगल के अतिरिक्त न्यायमूर्ति एस ए बोबडे जो अब मुख्य न्यायाधीश हैं , न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ , न्यायमूर्ति अशोक भूषण व न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर इस मामले की सुनवाई वाली 5 सदस्यीय पीठ में शामिल थे।
👉 पीठ ने अपने सर्व सम्मत फैसले में विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक स्वीकार करते हुए यह समस्त 2.7 एकड़ भूमि मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट को सौंपने का फैसला सुनाया।(ट्रस्ट का गठन 3 माह के भीतर ही करने को पीटने फैसले में कहा गया है।)
👉 आगे इस भूमि पर मालिकाना हक के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड व निर्मोही अखाड़े के दावों को पीटने यद्यपि खारिज किया है , तथापि 6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराए जाने को कानून का उल्लंघन बताते हुए मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित स्थान पर 5 एकड़ जगह उपलब्ध कराने का निर्देश अपने 1049 पृष्ठों के फैसले में पीठ ने सरकार को दिया है।
👉 इस मामले के तीसरे पक्ष कार निर्मोही अखाड़े के सेवायत हक के दावे को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया है तथापि मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाले ट्रस्ट में उसे प्रतिनिधित्व प्रदान करने का निर्देश न्यायालय ने दिया है। निर्मोही अखाड़े के सदियों से राम लाला के सेवायत होने का दवा करते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण ,रखरखाव एवं सेवा के अधिकार का दावा अपनी दलीलों में किया था।
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जिसमें मध्यस्थता के प्रयास नाकाम रहने की बात कही गई थी . मध्यस्थता के प्रयास नाकाम रहने पर इस मामले में अब पुनः सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अगस्त से अक्टूबर 2019 के दौरान संपन्न ने की थी . लगातार 40 दिन तक चली इस सुनवाई के पश्चात रामलला विराजमान की ओर से दलीलें पेश करने वाले अधिवक्ताओं में 92 वर्षीय पूर्व एटॉर्नी जनरल के परासरण के अतिरिक्त सीएस वैद्यनाथन व पूर्व एडिशनल सॉलीसीटर जनरल पी. एस. नरसिह्मन व गोपाल सिंह विशारद की ओर से पूर्व सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से पी. एन. मिश्र ने , अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से हरी शंकर जैन ने निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील कुमार जैन ने निर्वाणी अखाड़ा के धर्मदास की ओर से जयदीप गुप्ता आदि ने दलीलें पेश की थी। शिया वक्फ बोर्ड कि वकील एम. सी. धींगरा मंदिर के पक्ष में दलीलें न्यायालय में प्रस्तुत की ।


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